Saturday, March 14, 2026


 घूमना अच्छा लगता है मुझे




घूमना अच्छा लगता है मुझे,
बचपन से ही;
यहाँ-वहाँ,
इस नगर- उस नगर।

पर,

बचपन में तो जा नहीं पाता था,
हर कहीं अपनी मर्जी से।

लेकिन,

अब निकल जाता हूँ हर कहीं,
खुद अकेला ही,
कहीं भी,
किसी भी राह पर,
किसी भी डगर पर।

देखे हैं नगर कई,
जंगल और पहाड़ भी,
कई नदियां और झरने भी।

पर,

मिटी नहीं तलब घूमने की,
कहीं कुछ छूट गया हो जैसे,
कोई एक जगह है ऐसी,
जहाँ घूमने की इच्छा बचपन से है।

हाँ, याद है मुझे,
एक जगह के बारे में सुना था मैंने,
दादी की कहानियों में,
या शायद स्कूल की किताबों में।

ऐसी जगह है एक,
जहाँ रहते है सब लोग,
मिल-जुल कर,
बिना किसी भेदभाव
या ईर्ष्या-जलन के।

न उनमें कोई हिन्दू है,
न है मुसलमान,
न कोई सिख है उनमें,
न है कोई इसाई।

मज़हब उनका एक है,
मानवता जिसे कहते हैं।

एक- दूजे की उन्नति देख कर,
होते है खुश वे,
और,
जब देखते हैं पतन किसी का,
हो जाते है दुखी,
वे खुद भी।

ऐसी ही है एक जगह दुनिया में कहीं,
खोज रहा हूँ बचपन से उसे,
मिली नहीं अब तक,
पर खोज जारी है,
मिलेगी जरुर,
आज नहीं तो कल सही।

© विजय कुमार बोहरा 

Thursday, March 12, 2026

नहीं है परवाह किसी को

 


हर कोई जी रहा है,

जिन्दगी को अपने हिसाब से।


नहीं है परवाह किसी को

इंसानियत की,

न मानवता की,

न नैतिकता की।


हर कोई भाग रहा है,

भौतिक सुखों के पीछे। 


नहीं है परवाह किसी को

अच्छाई की-बुराई की,

न किसी के जीने-मरने की,

न किसी के हंसने-रोने की।


जी रहे है जिन्दगी को सभी अपने हिसाब से।


खत्म होती जा रही है संसार से,

मानवीय भावनायें,

परदुःखकातरता,

और,

वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना।


हर कोई चाहता है बस,

अपने स्वार्थों की पूर्ति,

मौज-मस्ती करना,

हमेशा खुश रहना,

और,

हंसते-खिलखिलाते हुए जीवन बिताना।


चाहे चुकानी पडे कीमत इसकी,

दूसरों के दु:ख के रूप में,

दूसरों की खुशियाँ छीनकर,

दूसरों को तकलीफ पहुंचाकर।


नहीं है परवाह किसी एक को,

दूसरे की,

हर कोई जी रहा है जिन्दगी को,

बस अपने हिसाब से ।

© विजय कुमार बोहरा 


Saturday, March 7, 2026

 मैं और मेरी तन्हाई 

तन्हा हूँ मैं,
तन्हा जीवन है मेरा,
तन्हाई मेरी साथिन। 
तन्हा ही चलना है ज़िंदगीभर,
तन्हा ही करना है सामना मुश्किलों का। 

कहानी मेरी है,
लिखने वाला मैं हूँ,
कोई और क्यों करें दखलअंदाज़ी इसमें,
क्यों दूँ हक़ किसी और को ये। 
साक्षी मेरे सुख-दुःख की,
गवाह मेरे संघर्ष की,
रही है सदा तन्हाई ही।

क्या तकलीफें उठायी मैंने,
क्या कुछ सहा,
महसूस किया,
ये सब,
जाना-समझा है बस मेरी तन्हाई ने। 

तब,
क्यों दिखाऊं किसी और को जख्म अपने,
क्यों कोई समझेगा मुझे,
मेरी तकलीफों को। 
.
रास नहीं आती दुनिया मुझे,
न यहाँ के रीति-रिवाज़,
रहता हूँ बस इसीलिये तन्हा ही मैं। 

और कहता हूँ फक्र से,
हाँ तन्हा हूँ मैं,
तन्हा जीवन है मेरा,
तन्हाई मेरी साथिन। 
© विजय कुमार बोहरा 

Friday, March 6, 2026

क्यों 


 कल तक जो चाहते थे,

दूर जाना हमसे। 

क्यों आज पास आने के,
बहाने खोजा करते हैं। 

सहन न होता था जिनको,
हमारा आसपास भी होना। 

 क्यों आज वो ही हमे,
यहां वहाँ खोजा करते हैं। 

चाहते थे कभी,
ओझल  कर देना हमको,
नजरों से अपनी। 

क्यों आज वो ही खुद,
हमारी नज़रों में आना चाहते हैं। 

कहा था हमने तो,
कि,
बेक़सूर है हम,
लगा दिया फिर भी उन्होंने,
आरोप हम पर। 

और,

आज वो ही,
कसूरवार होना चाहते हैं। 
© विजय कुमार बोहरा 

Wednesday, March 4, 2026

अनुभूति 


रह पाता,
अगर मैं अकेला,रह जाता, 
हमेशा के लिये।

पर,आसान नहीं है, 
ऐसा करना। 

क्योंकि,जरूरत होती है इंसान को,सदा ही दूसरे इंसान की।

सोचता हूं क्या होता,अगर मैं आने ही न देता,किसी को जीवन में अपने।

पर संभव ही न था ऐसा हो पाना,

क्योंकि,

अकेले जीने की व्यथा को, 
महसूस किया है मैंने

करीब से,
इतना करीब से,

कि,

यह व्यथा भी बनकर रह गयी है,
एक अनुभूति जानी-पहचानी सी।
© विजय कुमार बोहरा 

किस्मतवाला 

 हँसता है,हंसाता है,

गम अपने वो,
सबसे छिपाता है। 

कहते हैं लोग,
खुश है वो,
और है,
किस्मतवाला भी। 

किये होंगे कर्म अच्छे,
 उस जनम में,
दे रहे हैं फल अच्छे जो,
इस जनम में। 

सुनता है वो,
दुखड़े उन मित्रों के,
है परेशान जो,
अपने ही बेटे-बहू से,
उनके परायेपन के बर्ताव से। 

मित्र आसूँ बहाते हैं,
वो सहानुभूति जताता है। 

और,

न जाने क्यों,
मित्रों के जाते ही,
फुट पड़ती है,
रुलाई उसकी भी। 
रो उठता है,
फूट -फूटकर,
वो खुद भी। 
© विजय कुमार बोहरा 

Tuesday, March 3, 2026

 बदलाव 


बहुत कुछ बदल चुका है यहां,

लोग कुछ को कुछ समझने लगे हैं।


पहले जो संकेत मात्र से समझ जाते थे,

अब बार-बार कहने से भी नहीं समझते।


सोचता हूँ,


छोड़ दूँ सबको।


पर ईगो है कि,

भूलने नहीं देता कुछ भी।


हरदम बस एक ही बात दिमाग में घूमती है,

कि

 पा लूँ किसी तरह वो सब,


छूट चूका है जो,

पीछे,

बहुत पीछे।


पर,

संभव नहीं ऐसा करना,


इसीलिए,


रहने देता हूँ,


जो,

जैसा,जहां,

जिस हाल में हैं।

© विजय कुमार बोहरा 

  घूमना अच्छा लगता है मुझे घूमना अच्छा लगता है मुझे, बचपन से ही; यहाँ-वहाँ, इस नगर- उस नगर। पर, बचपन में तो जा नहीं पाता था, हर कहीं अपनी मर...