घूमना अच्छा लगता है मुझे
VIJAY KUMAR BOHRA
Saturday, March 14, 2026
Thursday, March 12, 2026
नहीं है परवाह किसी को
हर कोई जी रहा है,
जिन्दगी को अपने हिसाब से।
नहीं है परवाह किसी को
इंसानियत की,
न मानवता की,
न नैतिकता की।
हर कोई भाग रहा है,
भौतिक सुखों के पीछे।
नहीं है परवाह किसी को
अच्छाई की-बुराई की,
न किसी के जीने-मरने की,
न किसी के हंसने-रोने की।
जी रहे है जिन्दगी को सभी अपने हिसाब से।
खत्म होती जा रही है संसार से,
मानवीय भावनायें,
परदुःखकातरता,
और,
वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना।
हर कोई चाहता है बस,
अपने स्वार्थों की पूर्ति,
मौज-मस्ती करना,
हमेशा खुश रहना,
और,
हंसते-खिलखिलाते हुए जीवन बिताना।
चाहे चुकानी पडे कीमत इसकी,
दूसरों के दु:ख के रूप में,
दूसरों की खुशियाँ छीनकर,
दूसरों को तकलीफ पहुंचाकर।
नहीं है परवाह किसी एक को,
दूसरे की,
हर कोई जी रहा है जिन्दगी को,
बस अपने हिसाब से ।
© विजय कुमार बोहरा
Saturday, March 7, 2026
मैं और मेरी तन्हाई
Friday, March 6, 2026
क्यों
कल तक जो चाहते थे,
Wednesday, March 4, 2026
अनुभूति
किस्मतवाला
हँसता है,हंसाता है,
Tuesday, March 3, 2026
बदलाव
बहुत कुछ बदल चुका है यहां,
लोग कुछ को कुछ समझने लगे हैं।
पहले जो संकेत मात्र से समझ जाते थे,
अब बार-बार कहने से भी नहीं समझते।
सोचता हूँ,
छोड़ दूँ सबको।
पर ईगो है कि,
भूलने नहीं देता कुछ भी।
हरदम बस एक ही बात दिमाग में घूमती है,
कि
पा लूँ किसी तरह वो सब,
छूट चूका है जो,
पीछे,
बहुत पीछे।
पर,
संभव नहीं ऐसा करना,
इसीलिए,
रहने देता हूँ,
जो,
जैसा,जहां,
जिस हाल में हैं।
© विजय कुमार बोहरा
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रुको नहीं चलते रहो आते हैं कांटे राह में, आने दो, चुभते हैं शूल पैरों में, चुभने दो। सहकर भी कष्ट सारे तुम, रुको नहीं, चलते रहो। छिपता है...
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