Saturday, October 25, 2025

 रुको नहीं चलते रहो


आते हैं कांटे राह में,

आने दो,

चुभते हैं शूल पैरों में,

चुभने दो। 

सहकर भी कष्ट सारे तुम,

रुको नहीं, चलते रहो।


छिपता है सूरज,

छिपने दो

ढलता है दिन,

ढलने दो

ज्ञान का दीप जलाकर,

मन में तुम

रुको नहीं, चलते रहो।


थकता है मन,

थकने मत दो

टूटता है भरोसा,

टूटने मत दो

लेकर आशा की किरण,

मन में तुम

रुको नहीं, चलते रहो।

© विजय कुमार बोहरा 

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