Tuesday, February 17, 2026

जीवन और मंजिल 


 जीवन एक पहेली है,

 समझो इसे।


जीवन एक उलझन है,

 जानो इसे।


हर वक्त सोचते हैं,

 क्यों चलना शुरू किया,

 कब तक चलते रहेंगे यूं ही।


न राह का पता है,

 न मंजिल का।


घर से निकले थे जब,

 जानते थे कहाँ जाना है,

 मंजिल भी निगाहों में थी,

 राह का भी पता था।


पर चार कदम चलते ही,

जाने क्या हो गया,

कि,

विस्मृत हो गयी मंजिल,

 भूल गये रास्ता।


आज भटकन है,

 भ्रम है,

 रास्ते

 कई है,

 मंजिल नदारद हैं।

© विजय कुमार बोहरा 

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