Sunday, February 15, 2026

 संभल जा ओ राही 


रुक गया वो फिर से चलते-चलते,

थम गया वो फिर से चलते-चलते, 

आ गयी है कुछ बाधायें राह में। 


मिल गयी है, 

कुछ अनजानी सी राहें,

आकर उसकी राहों में। 

भटक गया है वो,

फिर से अपनी मंज़िल से। 


रखना होगा याद उसे,

सदा ही,

अपनी मंज़िल को,

अपनी राहों को। 


क्यों भटक जाता है वो,

बार-बार। 

समझना होगा उसे,

जानना होगा उसे,

अपनी मंज़िल को,

अपनी राहों को। 

© विजय कुमार बोहरा 




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