Wednesday, February 25, 2026

 प्रकाश की चाह 

हर तरफ छाया है अंधकार,

व्याकुल है हम,

परेशान है हम,
दिखती नही रोशनी कहीं।

करते हैं प्रयास,
छटपटाते है हाथ-पैर,
पर है हालत जस की तस।

अंधकार जाता नहीं,
प्रकाश आता नहीं। 

अंधकार होता अगर बाहर ही,
तो कर देते दूर इसे किसी तरह, 
पर है यह तो हमारे ही भीतर। 

न इसे दूर कर पा रहे हैं,
न मिटा पा रहे हैं। 

साधन नहीं है इसे दूर करने का,
पास हमारे। 

तब हो कैसे सिद्धि लक्ष्य की,
जानना होगा, समझना होगा।
© विजय कुमार बोहरा 

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