किसी एक की तलाश में
अजनबी सी राहें हैं,
चलते रहना जिंदगी हैं।
चले जा रहे हैं बिना रुके,
न राह का पता है,
न मंजिल का।
बस इसी उम्मीद में
कि शायद आज नहीं तो कल सही,
जान ही जायेंगे हकीकत अपनी जिंदगी की।
कैसी राहें है ये,
कैसी दुनिया है ये,
नहीं दिखती रोशनी कहीं,
हर तरफ है गुमनामी के अँधेरे।
इन्ही अँधेरों में कहीं,
खोकर रह गयी है जिंदगी मेरी भी।
बस जी रहे हैं किसी एक की तलाश में।
© विजय कुमार बोहरा

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