Friday, February 27, 2026

अंधेरा 


शहर में हर तरफ एक खामोशी थी,

देखा मैंने जिधर भी,

छाया था सिर्फ अंधेरा।


नहीं था ऐसा कोई,

मिटा पाता जो,

उस अंधेरे को।


खोजा मैंने बहुत,

पर मिला नहीं कोई।


था ही नहीं कोई उस शहर में,

जो मिलता मुझे वहां।


थक गया जब मैं खोजते खोजते,

आयी एक आवाज पीछे से-

''लौट जाओ मुसाफिर,

ये शहर नहीं है दया के काबिल।

यहां के वासियों ने ही किया था अंधेरा,

खुद अपने शहर में।

और खो गए वे ही,

उसी अंधेरे में।''

© विजय कुमार बोहरा 

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