Saturday, February 28, 2026
Friday, February 27, 2026
अंधेरा
शहर में हर तरफ एक खामोशी थी,
देखा मैंने जिधर भी,
छाया था सिर्फ अंधेरा।
नहीं था ऐसा कोई,
मिटा पाता जो,
उस अंधेरे को।
खोजा मैंने बहुत,
पर मिला नहीं कोई।
था ही नहीं कोई उस शहर में,
जो मिलता मुझे वहां।
थक गया जब मैं खोजते खोजते,
आयी एक आवाज पीछे से-
''लौट जाओ मुसाफिर,
ये शहर नहीं है दया के काबिल।
यहां के वासियों ने ही किया था अंधेरा,
खुद अपने शहर में।
और खो गए वे ही,
उसी अंधेरे में।''
© विजय कुमार बोहरा
Thursday, February 26, 2026
किसी एक की तलाश में
अजनबी सी राहें हैं,
चलते रहना जिंदगी हैं।
Wednesday, February 25, 2026
प्रकाश की चाह
हर तरफ छाया है अंधकार,
व्याकुल है हम,
Tuesday, February 24, 2026
जरा नियामत और बरसा दे!
अकेलापन! तन्हाई!
Sunday, February 22, 2026
एक इंसान
देखता हूँ हमेशा से मैं,
अपने सामने के उस मकान को,
रहता है जिसमें एक अकेला वृद्ध इंसान।
सोचता हूँ,
क्यों है वो अकेला ,
क्यों नहीं रहते,
उसके घर में और कोई?
निकलता है वो जब भी घर से बाहर,
रहती है उसके चेहरे पर,
एक अजीब सी उदासी।
पर रहने नहीं देता,
वो उस उदासी को,
अधिक समय तक,
चेहरे पर अपने।
जाता है वो सीधा उस पार्क में,
खेलते हैं जहां बच्चे,
बेफिक्र होकर।
और बन जाता है वो भी,
उनके साथ का,
एक छोटा सा बच्चा।
© विजय कुमार बोहरा
Saturday, February 21, 2026
जीवन की उलझन
आज फिर दिन निकला,
आज फिर नयी सुबह आयी।
सोचते हैं हर रोज,
कि,
आज तो करेंगे कुछ ऐसा,
बन जाए जिससे,
दिन हमारा सार्थक,
और,
एक एक दिन से मिलकर बन जाए,
जीवन हमारा सार्थक।
पर,
हाय नियति!
कैसे संभव है ऐसा हो पाना।
जब रात-दिन,
सुबह-शाम,
सोते-जागते,
पल-प्रतिपल,
हर क्षण;
तेरी ही यादें,
तेरी ही बातें,
तेरे ही खयाल,
छाये रहते हैं,
दिल और दिमाग में।
चाहा था हमने,
जीवन को संवारना,
दिल को संभालना।
पर,
हुआ न जाने क्या,
कि,
न जीवन संवरा,
न दिल संभला।
और,
आज हालात ये हैं कि,
जीवन रह गया है उलझकर,
दिल के रिश्तों में।
© विजय कुमार बोहरा
Tuesday, February 17, 2026
जीवन और मंजिल
जीवन एक पहेली है,
समझो इसे।
जीवन एक उलझन है,
जानो इसे।
हर वक्त सोचते हैं,
क्यों चलना शुरू किया,
कब तक चलते रहेंगे यूं ही।
न राह का पता है,
न मंजिल का।
घर से निकले थे जब,
जानते थे कहाँ जाना है,
मंजिल भी निगाहों में थी,
राह का भी पता था।
पर चार कदम चलते ही,
जाने क्या हो गया,
कि,
विस्मृत हो गयी मंजिल,
भूल गये रास्ता।
आज भटकन है,
भ्रम है,
रास्ते
कई है,
मंजिल नदारद हैं।
© विजय कुमार बोहरा
Sunday, February 15, 2026
नकल प्रथा
'फेल नहीं होता बेटा मेरा,
करवा पाता अगर परीक्षा में,
नक़ल मैं उसको।
पर,
हो न पाया ऐसा,
वर्ना ताकत थी किसमें इतनी,
कि,
कर पाता फेल,
बेटे को मेरे।'
कहा एक शिक्षक ने जब,
सुनाते हुए व्यथा अपनी,
देखा मैंने उसकी ओर।
मानो,
न हो वह कोई शिक्षक,
हो वह तो एक नेता ऐसा,
है जो भ्रष्ट,
आपादमस्तक।
रुख्सत हुआ वहाँ से जब,
सोचता रहा दिनभर,
बस यही कि,
कैसा है आज का शिक्षक,
चाहिए रोकना जिसे,
गोरखधंधा नक़ल का,
दे रहा है वही शिक्षक,
बढ़ावा आज उसे।
परखा,जाना,समझा,
जब आस-पास के माहौल को,
ज्ञात हुआ मुझे,
कि,
जकड चुके है हम,
'नक़ल प्रथा' की ऐसी बेड़ियों में,
नहीं हैं सहज,
मुक्त होना जिनसे।
सही है कि,
उलझे हैं हम,
एक बड़े चक्रव्यूह में।
पर,
रह नहीं सकते हम,
यूँ ही रखे,
हाथों पर हाथ।
रखना होगा धैर्य हमे,
है नहीं उपाय आज,
पास हमारे।
पर मिलेगा,
समाधान कोई तो,
इस समस्या का,
आज नहीं तो,
कल सही।
© विजय कुमार बोहरा
संभल जा ओ राही
रुक गया वो फिर से चलते-चलते,
थम गया वो फिर से चलते-चलते,
आ गयी है कुछ बाधायें राह में।
मिल गयी है,
कुछ अनजानी सी राहें,
आकर उसकी राहों में।
भटक गया है वो,
फिर से अपनी मंज़िल से।
रखना होगा याद उसे,
सदा ही,
अपनी मंज़िल को,
अपनी राहों को।
क्यों भटक जाता है वो,
बार-बार।
समझना होगा उसे,
जानना होगा उसे,
अपनी मंज़िल को,
अपनी राहों को।
© विजय कुमार बोहरा
Friday, February 13, 2026
क्यों
क्यों थक गए तुम,
चलते चलते।
क्यों रुक गए तुम,
मंज़िल तक पहुंचने से पहले।
हुए नहीं अभी,
कांटो से भी रूबरू
और,
फूलो को देखकर ही बहकने लगे।
जाना है अभी तो,
बहुत आगे,
चलना है अभी तो,
मीलो दूर,
आया नहीं अभी तो,
पहला पड़ाव भी,
और,
अभी से तुम थकने लगे।
मिलेंगे राही और भी,
आएँगी बहारे और भी,
पर,
रुकना नहीं है तुम्हे कहीं,
चलना है अभी तो,
मीलो दूर।
मंज़िल तक पहुंचना है,
आज नहीं तो कल सही।
© विजय कुमार बोहरा
Thursday, February 12, 2026
रास्ता और मंजिल
रास्ता लम्बा था,
मंज़िल दूर थी ,
Wednesday, February 11, 2026
चलते रहो राही!
Tuesday, February 10, 2026
अपनी ही धुन में
Monday, February 9, 2026
करु कुछ मैं भी, बनूँ कुछ मैं भी
सपना है मेरा छोटा-सा,
घूमना अच्छा लगता है मुझे घूमना अच्छा लगता है मुझे, बचपन से ही; यहाँ-वहाँ, इस नगर- उस नगर। पर, बचपन में तो जा नहीं पाता था, हर कहीं अपनी मर...
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करु कुछ मैं भी, बनूँ कुछ मैं भी सपना है मेरा छोटा-सा, करु कुछ मैं भी, बनूँ कुछ मैं भी। इसी उम्मीद में बस, चलता हूँ, आगे बढता हूँ। आती हैं ...
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रुको नहीं चलते रहो आते हैं कांटे राह में, आने दो, चुभते हैं शूल पैरों में, चुभने दो। सहकर भी कष्ट सारे तुम, रुको नहीं, चलते रहो। छिपता है...
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अपनी ही धुन में चला जा रहा है वो, अपनी ही धुन में। न लोगों की खबर, न दुनिया की परवाह। जाना है उसे आगे, बहुत आगे। कहते हैं लोग- 'यह ...
















